Monday, November 06, 2006

सैलाब
















वक़्त के झरोखे से यादें रिस रही हैं
आशियानें में आज दरारें दिख रही हैं
दीवारें तो बहुत ऊंची खड़ी की थीं
आज उसमें सुराखें दिख रही हैं
धुंए की चादर तो बहुत लम्बी खींची
कमबख्त हवा भी आज तेज बह रही है

सहारे तो बहुत मजबूत बनाये थे
बुनियाद ही आज ढहती दिख रही है
रोका था जिस सैलाब को रेत की दीवार से
आज उसके तड़प की इन्तेहाँ दिख रही है
लबों को तो बमुश्किल सी लिया था
आँखों की आज बयानी दिख रही है
ज़ज्बे हलके हो जाते हैं कह देने से
यहाँ तो उलटी कहानी दिख रही है

2 comments:

Unknown said...

aapki kashish ki geheraai hamare pahunch ke pare hai..par aapke alfaaz hamara dil choo gayi...

Sudhanshu said...

awesome lines
really, it is not easy to manifest thoughts in rhthym. it has both beauty of thoughts and pleasent rhythm, good work, keep it up dost