स्याही सूख गयी , कलम खामोश है
मंजर यूं है, की ज़मीर -ए -आवाम बेहोश है
सियासत बिना ऊसूलों के नयी बात नहीं
आवाम बिला उसूल जरूर। .. नयी तस्वीर है
सरफ़रोशी की तमन्ना रखने वालों को भी... अब
दिल में छुपा के रखने की इज़ाज़त नहीं
वतनपरस्ती। .... अब कोई इबादत नहीं
साज़ो -सामान है। ....जिसकी नुमाइश ज़रूरी है
कोई सरफिरा बड़बड़ा रहा था। ... कोई सरफिरा बड़बड़ा रहा था
कि सैंतालिश में आज़ाद हुए
गर आज़ाद हैं तो ये पहरे किसने बिठाये
हवा में जहर किसने घोला। ...पानी को लाल किसने किया
लहू को गुलाल किसने किया। .....इंसानियत को हलाल किसने किया
गर आदमी की पहचान उसका निवाला और कलावा है
फिर तो ये आज़ादी एक दिखावा और छलावा है
अब भी कहीं कोई दो वक़्त रोटी की कशमकश में है
ज़िन्दगी झूझती है। ...ज़िंदा रहने की हुज्जत में है
पर हमें क्या। ...पर हमें क्या
हम तरक्की शुदा मुल्क के बाशिंदे हैं। .
सोशल मीडिया पे ट्रेंडिंग हैं। ..
इंटेल्लिचुअल्ली इवॉल्वड हैं
आज फिर चार सौ कमेंट करेंगे। ..आज फिर चार सौ कमेंट करेंगे
पांच सौ लोगों को गलियां देंगे
इस कैंप या उस कैंप में बाँट जायेंगे
अपने अधूरे देश प्रेम का झंडा फहराएंगे
कंप्यूटर बंद करेंगे। ..और आल नाईट पार्टी में जायेंगे
Wednesday, September 13, 2017
bambaiyya
तो लो भैय्या, अब हम भी हो गए बम्बैय्या
४ डिब्बे पहले हो..... कूदना , या शश श करके ....बातें करना
अब अपन का दिन मिसळ पाव से शुरू ....और पावभाजी पे ख़तम
चिपचिपाती गर्मी हो या ....झमझमाती बरसात
हर ान ुभव एक नया सा है
ज़िंदादिली का दूसरा नाम है मुंबई
अबकी तो मटकी भी फोड़े , बप्पा का स्वागत भी किया
कहते हैं "सिटी नेवर स्लीप्स "
सही कहते हैं
जब सपने हों हज़ार, तो नींद का कैसे आये विचार
सब तरफ है दौड़, हर तरफ है दौड़,
पर ज़िन्दगी भी तो दौड़ ही है
यहाँ बस .....ज़रा तेज़ भागती है
जो हाथ सीट के लिए धक्का देते हैं ,
वही बहार लटकने पर संभाल भी लेते हैं
दिन की भगदड़ के बाद लोकल के अनजान चेहरों में
बिना नाम की कुछ मुस्कानें सुकून देती है
कुछ दुआ सलाम होती है,
थक हार के समंदर किनारे बैठो
तो जैसे शोर में ......एक अलग ख़ामोशी होती है
लहरें जैसे कुछ कान में चुपके से कहती हैं
मैं भी उस वक़्त को सोच के मुस्कुरा देता हूँ
जब शहर के साथ पहली थी मुलाकात
लगता है जैसे कल की ही हो बात
और अब कोई पुरानी दोस्ती लगती है
कुछ तो है शहर में बात, जो अजनबी को बनाये ख़ास
हर एक को अपने में समां के, रखती है दिल के पास
तो भाई चलो .....अब आ गया मलाड ,
बाकी की कहानी कल सुनाएंगे भैय्या
अब हम भी हो गए बम्बैय्या
४ डिब्बे पहले हो..... कूदना , या शश श करके ....बातें करना
अब अपन का दिन मिसळ पाव से शुरू ....और पावभाजी पे ख़तम
चिपचिपाती गर्मी हो या ....झमझमाती बरसात
हर ान ुभव एक नया सा है
ज़िंदादिली का दूसरा नाम है मुंबई
अबकी तो मटकी भी फोड़े , बप्पा का स्वागत भी किया
कहते हैं "सिटी नेवर स्लीप्स "
सही कहते हैं
जब सपने हों हज़ार, तो नींद का कैसे आये विचार
सब तरफ है दौड़, हर तरफ है दौड़,
पर ज़िन्दगी भी तो दौड़ ही है
यहाँ बस .....ज़रा तेज़ भागती है
जो हाथ सीट के लिए धक्का देते हैं ,
वही बहार लटकने पर संभाल भी लेते हैं
दिन की भगदड़ के बाद लोकल के अनजान चेहरों में
बिना नाम की कुछ मुस्कानें सुकून देती है
कुछ दुआ सलाम होती है,
थक हार के समंदर किनारे बैठो
तो जैसे शोर में ......एक अलग ख़ामोशी होती है
लहरें जैसे कुछ कान में चुपके से कहती हैं
मैं भी उस वक़्त को सोच के मुस्कुरा देता हूँ
जब शहर के साथ पहली थी मुलाकात
लगता है जैसे कल की ही हो बात
और अब कोई पुरानी दोस्ती लगती है
कुछ तो है शहर में बात, जो अजनबी को बनाये ख़ास
हर एक को अपने में समां के, रखती है दिल के पास
तो भाई चलो .....अब आ गया मलाड ,
बाकी की कहानी कल सुनाएंगे भैय्या
अब हम भी हो गए बम्बैय्या
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