Sunday, November 12, 2006

तस्वीर















देखी एक तस्वीर ऐसी
कि दिल से एक आह उठी
एक बाप के हाथों में
उसकी बेटी की लाश दिखी
असहाय चेहरा,सूनी आँखें
बहुत कुछ कहती सी लगीं
या शायद शब्दों की सीमा ,
बहुत छोटी सी लगी
जिन आँखों में सपने,
अभी सजने ही शुरू हुए थे
वो आँखें सदा के लिए मुंदी सी लगीं
क्यों फ़र्क होता है इतना सोच में इंसान के
किसी की जान की कीमत ,
भी क्यों बेमोल सी लगी
जीना और मरना कहते हैं
खेल किस्मत का
किस्मत की चाभी कैसे इंसान के हाथ लगी
अरे ...कोई तो समझाओ इन मौत के फरिश्तों को
उजाड़ने में आशियाँ बेकसूरों का
क्या ख़ुशी सी मिली
बयानी उस दर्द की कैसे करूं मैं
जो पीर जिंदगी को मौत से बदतर बना गयी
अरे ...मारा ही था
तो ख़त्म कर ही दिया होता सबको
सफ़र की तन्हाई कुछ कम हो गयी होती

Monday, November 06, 2006

अनुत्तरित















निःशब्द ..निरुत्तर ..मूक दर्शक
है मानव प्रकृति के चक्रों का
जीवन है खेल कठपुतलियों का
डोर है किसी और के हाथ में
नाचते हैं सारे उसके इशारों पर
फ़र्क सिर्फ़ इतना है
ह्रदय नहीं होता कठपुतलियों के
तो एहसास भी नहीं होता
इधर तो कहानी है विचित्र
ज्ञांत है सबका औचित्य
फिर भी क्यूँ समझकर ..स्वयं को कर्त्ता
बार -बार कर्त्ता वही भूल
हर बार बनता है शिकार ...नियति का
फ़िर भी समझता स्वयं को ...निर्माता उसका
किसकी है ये भूल
शायद भूल उसकी भी नहीं
शायद ये नियति ही है
मानव की प्रकृति ही है
जो करती है बाध्य ...अनवरत
दुहराने को उन भूलों को
और फ़िर पछताने को
होगा कोई उत्तर इन प्रश्नों का
या रहेंगे ये हमेशा अनुत्तरित


सैलाब
















वक़्त के झरोखे से यादें रिस रही हैं
आशियानें में आज दरारें दिख रही हैं
दीवारें तो बहुत ऊंची खड़ी की थीं
आज उसमें सुराखें दिख रही हैं
धुंए की चादर तो बहुत लम्बी खींची
कमबख्त हवा भी आज तेज बह रही है

सहारे तो बहुत मजबूत बनाये थे
बुनियाद ही आज ढहती दिख रही है
रोका था जिस सैलाब को रेत की दीवार से
आज उसके तड़प की इन्तेहाँ दिख रही है
लबों को तो बमुश्किल सी लिया था
आँखों की आज बयानी दिख रही है
ज़ज्बे हलके हो जाते हैं कह देने से
यहाँ तो उलटी कहानी दिख रही है

Sunday, November 05, 2006

द्वन्द
















उद्भव इन भावों का
मन के उद्गारों का
दर्पण विचारों का
शब्दों की छाया में
भावनाओं की अभिव्यक्ति
कभी होती है कृति
कभी बन जाती विकृति
ये भी होती है प्रवृत्ति
जो होती परिलछित
उन भावों में
उन विचारों में
मस्तिष्क की होती है प्रकृति
भटकाव ...
कभी मिलता है लक्ष्य
कभी बन जाता केवल सफ़र
मन और मस्तिष्क का ये द्वन्द
जो होता अनवरत
इन्ही द्वंदों की अभिव्यक्ति
होती है कृतियों में
उत्तरों की खोज होती है प्रश्नों में
स्वयं की प्रछाया का
दर्शन होता है
कभी धुंधली , कभी स्पष्ट
व्यक्त स्व को करने के प्रयत्न
होते हैं जनक
विभिन्न छायाओं के
कभी कोई खुद सी लगती
कभी अंतर जमीन -आसमान का
ये द्वंदों का सफ़र है अनंत
अनंत के इस सफ़र का है स्वागत
स्व की पहचान के हैं ये वाहक