Monday, November 06, 2006

अनुत्तरित















निःशब्द ..निरुत्तर ..मूक दर्शक
है मानव प्रकृति के चक्रों का
जीवन है खेल कठपुतलियों का
डोर है किसी और के हाथ में
नाचते हैं सारे उसके इशारों पर
फ़र्क सिर्फ़ इतना है
ह्रदय नहीं होता कठपुतलियों के
तो एहसास भी नहीं होता
इधर तो कहानी है विचित्र
ज्ञांत है सबका औचित्य
फिर भी क्यूँ समझकर ..स्वयं को कर्त्ता
बार -बार कर्त्ता वही भूल
हर बार बनता है शिकार ...नियति का
फ़िर भी समझता स्वयं को ...निर्माता उसका
किसकी है ये भूल
शायद भूल उसकी भी नहीं
शायद ये नियति ही है
मानव की प्रकृति ही है
जो करती है बाध्य ...अनवरत
दुहराने को उन भूलों को
और फ़िर पछताने को
होगा कोई उत्तर इन प्रश्नों का
या रहेंगे ये हमेशा अनुत्तरित


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