Sunday, November 05, 2006

द्वन्द
















उद्भव इन भावों का
मन के उद्गारों का
दर्पण विचारों का
शब्दों की छाया में
भावनाओं की अभिव्यक्ति
कभी होती है कृति
कभी बन जाती विकृति
ये भी होती है प्रवृत्ति
जो होती परिलछित
उन भावों में
उन विचारों में
मस्तिष्क की होती है प्रकृति
भटकाव ...
कभी मिलता है लक्ष्य
कभी बन जाता केवल सफ़र
मन और मस्तिष्क का ये द्वन्द
जो होता अनवरत
इन्ही द्वंदों की अभिव्यक्ति
होती है कृतियों में
उत्तरों की खोज होती है प्रश्नों में
स्वयं की प्रछाया का
दर्शन होता है
कभी धुंधली , कभी स्पष्ट
व्यक्त स्व को करने के प्रयत्न
होते हैं जनक
विभिन्न छायाओं के
कभी कोई खुद सी लगती
कभी अंतर जमीन -आसमान का
ये द्वंदों का सफ़र है अनंत
अनंत के इस सफ़र का है स्वागत
स्व की पहचान के हैं ये वाहक

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