
वक़्त के झरोखे से यादें रिस रही हैं
आशियानें में आज दरारें दिख रही हैं
दीवारें तो बहुत ऊंची खड़ी की थीं
आज उसमें सुराखें दिख रही हैं
धुंए की चादर तो बहुत लम्बी खींची
कमबख्त हवा भी आज तेज बह रही है
सहारे तो बहुत मजबूत बनाये थे
बुनियाद ही आज ढहती दिख रही है
रोका था जिस सैलाब को रेत की दीवार से
दीवारें तो बहुत ऊंची खड़ी की थीं
आज उसमें सुराखें दिख रही हैं
धुंए की चादर तो बहुत लम्बी खींची
कमबख्त हवा भी आज तेज बह रही है
सहारे तो बहुत मजबूत बनाये थे
बुनियाद ही आज ढहती दिख रही है
रोका था जिस सैलाब को रेत की दीवार से
आज उसके तड़प की इन्तेहाँ दिख रही है
लबों को तो बमुश्किल सी लिया था
आँखों की आज बयानी दिख रही है
ज़ज्बे हलके हो जाते हैं कह देने से
लबों को तो बमुश्किल सी लिया था
आँखों की आज बयानी दिख रही है
ज़ज्बे हलके हो जाते हैं कह देने से
यहाँ तो उलटी कहानी दिख रही है
2 comments:
aapki kashish ki geheraai hamare pahunch ke pare hai..par aapke alfaaz hamara dil choo gayi...
awesome lines
really, it is not easy to manifest thoughts in rhthym. it has both beauty of thoughts and pleasent rhythm, good work, keep it up dost
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