
देखी एक तस्वीर ऐसी
कि दिल से एक आह उठी
एक बाप के हाथों में
उसकी बेटी की लाश दिखी
असहाय चेहरा,सूनी आँखें
बहुत कुछ कहती सी लगीं
या शायद शब्दों की सीमा ,
बहुत छोटी सी लगी
जिन आँखों में सपने,
अभी सजने ही शुरू हुए थे
वो आँखें सदा के लिए मुंदी सी लगीं
क्यों फ़र्क होता है इतना सोच में इंसान के
किसी की जान की कीमत ,
भी क्यों बेमोल सी लगी
जीना और मरना कहते हैं
खेल किस्मत का
किस्मत की चाभी कैसे इंसान के हाथ लगी
अरे ...कोई तो समझाओ इन मौत के फरिश्तों को
उजाड़ने में आशियाँ बेकसूरों का
क्या ख़ुशी सी मिली
बयानी उस दर्द की कैसे करूं मैं
जो पीर जिंदगी को मौत से बदतर बना गयी
अरे ...मारा ही था
तो ख़त्म कर ही दिया होता सबको
सफ़र की तन्हाई कुछ कम हो गयी होती


