Wednesday, September 13, 2017

स्याही सूख गयी , कलम खामोश है
मंजर यूं है, की ज़मीर -ए -आवाम बेहोश है

सियासत बिना ऊसूलों के नयी बात नहीं
आवाम बिला उसूल जरूर। .. नयी तस्वीर है

सरफ़रोशी की तमन्ना रखने वालों को भी... अब
दिल में छुपा के रखने की इज़ाज़त नहीं

वतनपरस्ती। .... अब कोई इबादत नहीं
साज़ो -सामान है। ....जिसकी नुमाइश ज़रूरी है

कोई सरफिरा बड़बड़ा रहा था। ... कोई सरफिरा बड़बड़ा रहा था
 कि सैंतालिश में आज़ाद हुए

गर आज़ाद हैं तो ये पहरे किसने बिठाये
हवा में जहर किसने घोला। ...पानी को लाल किसने किया
लहू को गुलाल किसने किया। .....इंसानियत को हलाल किसने किया

गर आदमी की पहचान उसका निवाला और कलावा है
फिर तो ये आज़ादी एक दिखावा और छलावा है

अब भी कहीं कोई दो वक़्त रोटी की कशमकश में है
ज़िन्दगी झूझती है। ...ज़िंदा रहने की हुज्जत में है

पर हमें क्या। ...पर हमें क्या
हम तरक्की शुदा मुल्क के बाशिंदे हैं। .
सोशल मीडिया पे ट्रेंडिंग हैं। ..
इंटेल्लिचुअल्ली इवॉल्वड हैं

आज फिर चार सौ कमेंट करेंगे। ..आज फिर चार सौ कमेंट करेंगे
पांच सौ लोगों को गलियां देंगे

इस कैंप या उस कैंप में बाँट जायेंगे
 अपने अधूरे देश प्रेम  का झंडा फहराएंगे
कंप्यूटर बंद करेंगे। ..और आल नाईट पार्टी में जायेंगे


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