दरख़्त के नीचे दो लम्हा आँख लगी , ख़ुली तो अजनबियों के शहर में
तुम्हारे शहर में चंद लम्हों में घर की याद शिद्दत से आई है
ऊंची ईमारत ऊंचे लोग सब बहुत अच्छा है, पर मुझे मेरी छोटी बस्ती अच्छी लगती है
ये अजनबी शहर तुम्हे मुबारक, हम तो अपनी दुनिया में अच्छे थे
ये तौर तरीके इस शहर के हमसे हमीं को चुरा ले गए
वादा था शाम वापस आने का ...
No comments:
Post a Comment